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"My art is my search for the moments beyond the ones of self knowledge. It is the rhythmic fantasy; a restless streak which looks for its own fulfillment! A stillness that moves within! An intense search for my origin and ultimate identity". - Meena

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Monday, 2 July 2012

ओस की एक बूँद - The Dewdrop - Oas ki Ek Boond

ओस में डूबता अंतरिक्ष
विदा ले रहा है
अँधेरों पर गिरती तुषार
और कोहरों की नमी से।

और यह बूँद न जाने
कब तक जियेगी
इस लटकती टहनी से
जुड़े पत्ते के आलिंगन में।

धूल में जा गिरी तो फिर
मिट के जाएगी कहाँ?

ओस की एक बूँद
बस चुकी है कब की

मेरे व्याकुल मन में।
-© Meena Chopra (above drawing is by Meena Chopra)
- From upcoming collection 'Subeh ka Suraj ab Mera Nahin Hai'.

Oas me doobata antariksh
bida le raha hai andharon per girti tushar
aur koharon ki namee se
aur yeh boond kab tak jiyegi
is latakti tahani se jude patte ke alingan me
dhool me ja giri to phir mit ke jayegi kahan
aus ki ek boond bas chuki hai kabaki
mere wyakul man me.


(Transcreation)
The Dewdrop

The dewdrop
Submerged the universe.
departed
the misty
damp cold nights
Hugged
A fresh and short lived leaf.
Clung to the suspended branch,
A life span.

What is the chance ?
Will it last?
If it falls
on the grounded dust
in a final thrust.
Vanishing ever.

Yet it yearns,
Stilling the beats
Ceasing -
As it never did.!





- Meena Chopra

Saturday, 24 September 2011

बारिश के खिलोने - Misty Madness


 दौड़ती नज़रें जब
गुज़रे समय की सड़क पर
देखतीं हैं वापस मुड़कर
तो दिखाई देते हैं
दूर छोर पर खड़े
कुछ बारिश के खिलोने
और धूप की नर्मी में भीगे पुराने रिश्ते

और कुछ --
वक्त की धुन्ध में मिटते
पाओं के निशान।
-मीना चोपड़ा 


Blank eyes see
the vanishing point,
the skyline of the past.
I capture
the falling rainfall.
A soothing touch ,
the by gone sunshine
wet with the kisses of a rainbow.
Footsteps fade
in the misty madness of time.

(Trans-created from Hindi into English)
-Meena Chopra

 

Thursday, 22 September 2011

A Death, A Beginning - अरसे से गूँजती आवाज़

Have you ever searched?
Your lost self
unfolding those
ruthless cold nights
inside me ... ?
  Ever dreamt-?
  The blazing honesty of
  my unyielding
  unborn
  unprotected
  vulnerable naked self 
  in your arms,
enslaved in disastrous fantasies,
  tearing me apart
  making me a whole
  grasping a moment
  beyond bondages,
  seizing
  a death,
  a beginning
  an eternal embrace
  unraveling mysteries
  unknown ... ?
Have you ever discovered,
worshipped,
my primeval existence
  within you.
  Recognizing
  loving  the woman in me!

-Meena Chopra

अरसे से गूँजती आवाज़

खोजा है कभी तुमने
अपनी खोई हुई पहचान को
अँधेरी, सियाह, ठंडी रातों की
खुलती हुई परतों के तले
ढकी हुई मेरी कोख की
सुलगती परतों में।

तसव्वुर्र के उस एक एहसास को
क्या महसूस किया है कभी तुमने
जहाँ एक अजन्मी, कोरी आग
की लपटों में लिपटा
मेरा कँपकपाता नाज़ुक सा जिस्म
कई टूटते ख्वाबों में उलझा रहा
तुम्हरी बाहों में
कभी उधेड़ता रहा और कभी बुनता रहा
भटकती साँसो के भटकते हुए सपने।

लम्हों को लम्हों में
तलाशता हुआ
वही एक आज़ाद सा लम्हा
उस मौत के आगा़ज़ को ढूढ़ता रहा
जिसमे का़यनात के आगोश से उतरा हुआ
एक अनजाना सा आगोश तुम्हारा
बाँधता रहा मेरी खुलती हुई परतों के
पल-पल पिघलते अन्तराल को-


पूछ्ती हूँ मैं तुमसे

कभी ढूढ़ी है तुमने
इबादत में झुकी नज़रों में
मेरी बरसों से बिछ्ड़ी हुई वही फ़रियाद
जन्मो से जन्मो तक बहती रही 
मुहोब्बत भरी आँखों की
झुकी पलकों में
झपकती हुई एक पुकार
सदियों से जूझती
सिर्फ़ तुम्हारे लिये
सदियों से बनी
हमेशाँ से वही तुम्हारी
-मैं
एक अरसे से गूँजती आवाज़।

-मीना चोपड़ा 
(अंग्रेजी से हिंदी में भावानुवाद)





Sunday, 22 May 2011

माणिक - White Canvas


चित्र - मीना द्वारा निर्मित
Drawing by Meena 

सपनों के सपाट कैनवास पर
रेखाएँ खींचता
असीम स्पर्श तुम्हारा
कभी झिंझोड़ता
कभी थपथपाता
कुछ खाँचे बनाता
आँकता हुआ चिन्हों को
रंगों से तरंगों को भिगोता रहा
एक रात का एक मख़मली एहसास।


     कच्ची पक्की उम्मीदों में बँधा
        सतरंगी सा उमड़ता आवेग
          एक छलकता, प्रवाहित इंद्रधनुष
          झलकता रहा गली-कूचों में
        बिखरी सियाह परछाइयों
     के बीच कहीं दबा दबा।


                रात रोशन थी
      श्वेत चाँदनी सो रही थी मुझमें
                    निष्कलंक!
                  अँधेरों की मुट्ठी में बंद
              जैसे माणिक हो सर्प के
           फन से उतरा हुआ।
 
सुबह का झुटपुटा
झुकती निगाहों में
बहती मीठी धूप
थम गया दर्पण दिन का
अपने अक़्स में गुम होता हुआ।

और तब
थका-हारा, भुजंग सा
दिन का यह सरसराता धुँधलका
सरकता रहा परछाइयों में प्रहर - प्रहर।
नींद में डूबी अधखुली आँखों के बीच
फासलों को निभाता यूँ दरबदर
साथ चलता रहा मेरे
एकटक आठों प्रहर।

(भावार्थ "वाईट कैनवास"
संकलन "सुबह का सूरज अब मेरा नहीं है" में प्रकाशित) 


 


White Canvas
 
Your vivid stroke
etched in my memory
bestirred my stark white canvas.
A passing night clasped me
replete with colours.
Raw impulses wide awake
splashed shades
tinting the sheet
toning the moods.

 A splendor bedded
with me all night.

A river
oozed out in heat.
My opaque vision.
grasped the forthcoming dawn.

A fatigue

tarried within me
throughout the day.
(from collection"Ignited Lines")

Wednesday, 18 May 2011

क्या था वह?


Drawing by Meena chopra
सिलेटी शाम के
   ढलते रंग
     निःशब्द, निशाचरी, निरी रात
         उदासीन, तठस्थ सफेद चेहरे
        अपरिचित नाम
        अनजान शब्द
         खड़े थे रूबरू हमारे।

        क्या था वह —?
         शायद कोई अनुनाद —?
          जिसे तुम छू भर कर निकल गए
           और मैं देख भी न पाई।
            कोलाहल की धूल से भरी
            इन आँखों में
            केवल थी तो कालिख ही
         शोर की धुन्ध हमें टिकटिकी लगाये
        लगातार देखती थी |

        शायद एक शुरूआत के छोर पर      
            खड़े होकर हम
       दूर किसी अंत को समेटते हुए
      फिर एक बार
      एक नई आस के करीब
       बना रहे थे
        एक नया सा नसीब।
(Transcreated from Greying Evening
-Earlier published in "Ignited Lines")


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