VISUAL ARTS, POETRY, COMMUNITY ARTS, MEDIA & ADVERTISING
"My art is my search for the moments beyond the ones of self knowledge. It is the rhythmic fantasy; a restless streak which looks for its own fulfillment! A stillness that moves within! An intense search for my origin and ultimate identity". - Meena

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Sunday, 27 November 2016

ओस की एक बूँद



ओस की एक बूँद। .......



For my poetry kindly Visit: English: http://ignitedlines.blogspot.com Hindi: http://ignitedlines.blogspot.com/ website: http://meenachopra17.wix.com/meena-chopra-artist

Sunday, 28 August 2016

My Hindi poetry book SUBAH KA SOORAJ AB MERA NAHIN HAI is available on Amozon. You may click the link to find it. अब Amazon पर उपलब्ध No shipping charges http://www.amazon.in/dp/9384419273/ref=cm_sw_r_fa_dp_KHFjxb1JNJQTT




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Thursday, 3 September 2015

Read eBook of Hindi & Urdu Poets of Canada रंग और नूर رنگ اور نور RANG AUR NOOR (Colour & Radiance)

(कनाडा की उर्दू एवं हिंदी की काव्य प्रतिभाओं का काव्य संकलन) कनाडा का राष्ट्र जो की विश्व भर की विविधताओं का एक निरंतर प्रवाह है और अपने में उन्हें एक समुद्र की तरह समेटता भी है, उसकी पावन भूमी पर, "रंग और नूर" इ-काव्य संकलन, कनाडा में बसे हिंदी और उर्दू के रचनाकारों द्वारा विश्व भर के हिंदी और उर्दू के पाठकों और कविता प्रेमियों के लिए एक नया प्रयास है। Canada is a land of a continuous flow of world's diversity



Tuesday, 1 September 2015

Plese visit my Hindi poetry blog here....... प्रज्ज्वलित हैं वक़्त से गिरते पलों की कुछ सुर्ख परछाइयाँ ....

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Posted by Meena Chopra - Artist & Poet on Friday, August 28, 2015
For my poetry kindly Visit: English: http://ignitedlines.blogspot.com Hindi: http://ignitedlines.blogspot.com/ website: http://meenachopra17.wix.com/meena-chopra-artist

Monday, 31 August 2015

Meena Chopra Reading Hindi poem at Writers' Forum, Toronto



StarBuzzOnline

Tuesday, 26 November 2013

वो सितारा

"बहुत करीब था 
किनारा उफ़क का
मेरी नज़रों से मिल चुका था
फ़िर भी न जाने क्यों
मैं दूर होती चली गई उससे।

निगाहों में बंद कुछ लम्हे
खुलते चले गये।
उड़ते चले गये
छू लेने को वही रंगों से धनुष के भीगा
सौर मंडल में डूबता इकलौता सहारा अपना
मुद्द्तों से खोया हुआ वो सितारा  अपना।"
-मीना 

Friday, 11 October 2013

अमावस को—



Wednesday, 2 October 2013

दुशाला




Sunday, 12 May 2013

बहती खलाओं का वो आवारा टुकड़ा

कभी देखा था इसे 
पलक झपकती रौशानी के बीच 
कहीं छुपछूपाते हुए,   
जहां क्षितिज के सीने में उलझी मृगत्रिष्णा 
ढलती शाम के क़दमों में दम तोड़ देती है। 

और कभी 
हवा के झोंकों में लिपटे 
पत्तों की सरसराहट में 
इसकी मध्धम सी आवाज़ भी सुनी थी मैंने 
और कभी- 
यह उसी भीनी हवा के झोंके सा 
छू कर निकल गया था मुझे हलके से 
कभी 
फूल - फूल में 
इसकी खुशबू भी चुनी थी मैंने!
कभी 
इसने मुझे अपनी बाँहों में कैद करके 
जकड के रख लिया था 
अपने सीने की असीम तड़प के चुंगल में  

बहती खलाओं का 
वो आवारा टुकड़ा -

पल-पल मेरे साथ 
चलता भी  रहा 
जलता भी रहा-
जिसे संजो के रख लिया 
एक दिन मैंने  
दिल की हर एक धड़कन में 
और महसूस किया 
उसकी खुशबू को 
बहते पलों के अविरत झुरमुट में।  

देखा है आज उसे पहली बार 
मन के स्पष्ट दर्पण में
सुना है आज उसे ज़मीन की 
उभरती साँसों के निरन्तर स्पंदन में  
छुपा लिया है इसे 
हर पल के बहते हुए 
हर एक रंग में।  

बहती खलाओं का 
वो आवारा टुकड़ा -
घुल चूका है मिश्री सा 
मेरे जीवन के अविरल मिश्रण मे।
-Meena
Enhanced by Zemanta

Tuesday, 12 March 2013

औरत

ये वह शक्ति है जिसकी कोख में जीवन पनपता है 
वो ताकत है, जो सितारों भरी क़ायनात को जन्म देती है, 
जीवन को जगमगाहट और नज्जारों  को इल्म देती है,
धरा पे उगते फूलों, पौधों और पेड़ों को सींच देती है 
कहीं शबरी, कहीं मीरा, तो कहीं रानी झाँसी का रूप लेती है 

ये औरत है जो रण में जाते वीरों को विजय तिलक देती है 
ये औरतहै, निर्भय है, 
निर्भयता को जन्म देती है। 

(Dedicated to WWGC - World Women Global Council)

-मीना 

ye wo shakti hai jiski kokh main jeevan panapta hai
wo taakat hai, jo sitaron bhari quayanaat ko janm deti hai,
jeevan ko jagmagahat aur nazzaron ko ilm deti hai,
dhara pe ugte phoolon, paudhon aur pedon ko seench deti hai,
kahin Shabri, kahin Meera aur kahin Jhansi ki Raani ka roop leti hai.

ye aurat hai jo rann mein jate veeron ko vijay tilak deti hai,
ye aurat hai "nirbhaya" hai.
nirbhayata ko janm deti hai!
(dedicated to WWGC and "Nirbhay")
-Meena

"She is the power because she is the womb, where the life is created and from where the life is generated, she is the mother of the universe which is a spellbinding miraculous experience. She is the bearer of the eternal light of life and strength. She is the fearless one".


Monday, 2 July 2012

ओस की एक बूँद - The Dewdrop - Oas ki Ek Boond

ओस में डूबता अंतरिक्ष
विदा ले रहा है
अँधेरों पर गिरती तुषार
और कोहरों की नमी से।

और यह बूँद न जाने
कब तक जियेगी
इस लटकती टहनी से
जुड़े पत्ते के आलिंगन में।

धूल में जा गिरी तो फिर
मिट के जाएगी कहाँ?

ओस की एक बूँद
बस चुकी है कब की

मेरे व्याकुल मन में।
-© Meena Chopra (above drawing is by Meena Chopra)
- From upcoming collection 'Subeh ka Suraj ab Mera Nahin Hai'.

Oas me doobata antariksh
bida le raha hai andharon per girti tushar
aur koharon ki namee se
aur yeh boond kab tak jiyegi
is latakti tahani se jude patte ke alingan me
dhool me ja giri to phir mit ke jayegi kahan
aus ki ek boond bas chuki hai kabaki
mere wyakul man me.


(Transcreation)
The Dewdrop

The dewdrop
Submerged the universe.
departed
the misty
damp cold nights
Hugged
A fresh and short lived leaf.
Clung to the suspended branch,
A life span.

What is the chance ?
Will it last?
If it falls
on the grounded dust
in a final thrust.
Vanishing ever.

Yet it yearns,
Stilling the beats
Ceasing -
As it never did.!





- Meena Chopra

Wednesday, 13 June 2012

Memories of Space - शून्य की परछाईं

All the stars
engulfed in silence
trying to grab
the hands of futility.
The day explodes.
Whiteness spills
the residues of
the waning moon.
Death of the night
is still alive
in the memories of space.
- Meena Chopra


(Transcreation)
सितारों में लीन हो चुके हैं स्याह सन्नाटे
ख़लाओं को हाथों में थामें
दिन फूट पड़ा है लम्हा - लम्हा
रोशनी को अपनी
ढलती चाँदनी की चादर पर बिखराता
अंधेरों की गहरी मौत
शून्य की परछाईं में धड़कती है अब तक
जिंदा है
न जाने कब से —
न जाने कब तक
- Meena Chopra


(Above drawing by Meena Chopra)
sitaron me leen ho chuke hain syah sannate
khalaon ko haathon me thame
din phoot pada hai lamha - lamha
roshanee ko apani
dhalti chandani ki chaader per bikhrata.
andhoron ki maut
shunya ki parchhaien me
dhadakati hai ab tak
zinda hai
na jane kab se -
na jane kab tak!
(above drawing by Meena Chopra)

Sunday, 15 January 2012

युग

फ़ासलों की एक लम्बी सड़क
उम्र भर पहचानों के जंगलों से निकल
ज़मीन की तह से गुज़रती है |

            पसीनों से लथपथ
            पैरों के निशान
            बनते चले जातें हैं 
            हवाओं की सलीब पर 
            चढ़ते चले जाते हैं
गाढ़ते जातें हैं
कोई त्रिशूल या कोई खंडा
या फ़िर,
सूली पर चढ़े उस शख्स के
खून से भीगा चाँद तारे का
अम्बर के गुनाहों में
एक रिसता रिश्ता।
लहराता है,
दिशाओं को थामें
चूमता हवाओं को
बस वही एक अलम-
एक ही परचम!
कई जन्मों के टूटे बिखरे शहर
बस जातें हैं इसमें
साथ लिए कुछ पंख परिंदों के
और पेड़ों से टूटे पत्तों के
चुकते करम!

पतझड़ का आगोश घबरा कर
और भी बड़ा हो जाता है,
जहाँ सदियों की धूल में लिपटे यही पत्ते
सरगोशियों में उड़ा करतें हैं|
धूप की मद्धम किरणें
जड़ देतीं हैं खामोशियाँ
इनके तन पर|
         बांवाली पतझड़,
 झूमती है पहनकर
 मिट्टी की बेपनाह
 तपिश के कई रंग
 उलझकर इन महकते उड़ते रंगों में
 इतराती है,
 बलखाती है
 जैसे नाच उठे
 बेफिक्र, बेपरवाह सा
 कोई मस्त मलंग|

फ़िर थक हार कर
गिर जाती है ज़मीन पर
   इस छल भरे नृत्य की
      झीनी चूनर
     कुछ रंग भरे आलम
       एक पथराई सी सहर|
शीत की वही कड़वी ठण्ड
जिसके आगास का घूँट पीकर
सो चुके थे हम
 तनहा से
तनहाइयों में बंद।
      
एक बार फ़िर
छिटक जाता है कहीं दूर
पिछले चाँद का वही नूर
भर-भर के उडेल देता है कोई
रजातिम, रूपहला अबीर
बर्फीले ठंडे सीनों में भरी
दास्तानों के करीब।
  चमक उठता है
बर्फ पर सोता
    सन्नाटों का बेचाप रूआब
      कौंधते खवाबो की हकीकत
       खनखनाते चेहरों का शबाब
रात की हूर
इस दुशाले को ओढे
निकल पड़ती है
अपलक
सन्नाटों भरी बेनूर दूरियों की
अकेली पगडंडियों पर
सकपकाती,
खंडहरों से गुज़रती है
लांघती है,
बचपन की दहलीज़
टोहती है
किसी सूफियानी सुबह का
बूँद-बूँद पिघलता
साफ़ सुथरा स्वर्णिम सिन्दूर
मांग की सफेदी को भरता
एक चंपई नूर!
और तब,
टिमटिमाते किनारों पर खड़ा
अतीत में दम भरता
परखती आंखों से
वक्त को एक -टक निहारता
अय्यामों में गुम हो जाता है
एक पारदर्शी दॄश्य!
रुक जातें हैं
रुन्धते गलों के सुरों को टटोलते
निष्कंठ शब्दों में फसते हलंत !
लेकिन
इस मौन होती हुई कायनात से
छलकते छंदों के बीच
कौन बैठा था बिछाए पलकें?
ढूँढ रहा है अब भी -
बहते रहने की इस होड़ में
साँसों के सही हुलिए
कोई ठोस शिनाख्त
नियमों में बंद नामदार कोई
ध्वजों में अंकित उदाहरण देता
गुमनाम अलमस्त ही सही।

बस वही पलक झपकाता सिलसिला
  अपने नसीब से टूटा
   बस वही टूटी साँसों में
     भटकती सच्चाई
       छोर को छोर से बांधती
        स्वछन्द हर छोर को लांघती
    निरी सच्चाई!
टिमटिमाते किनारों पर बैठा
बस वही,
एक ही सिलसिला

कभी फ़िज़ाओं में बहता
कभी घूमता पगडंडियों पर और
खंडहरों के बीच से गुज़र
झील के किनारों पर ठहरता 
कभी सूलियों पर चढ़ता
कभी हवाओं में
बंद निशानों से गिरता
धुंधले से नसीब के दौर का
बस वही,
एक ही सिलसिला।


-मीना चोपड़ा 




Wednesday, 16 November 2011

चोरी के कुछ लम्हे Chori ke Kuchh lamhe

ज़िन्दगी के शोर से कुछ लम्हे चुरा के 
चल पड़ी हूँ उस छोर पे कदम अपने उठा के 
जहाँ सूरज डूबता है 
जहाँ मैं डूबती हूँ  हूँ 
रंगों के इस असीम दरिया में 
रंग अपने ढूँढती  हूँ |

Zindagi ke shor se kuchh lamhe chura ke
chal padi hoon us chhor pe kadam apne uTha ke
jahan sooraj doobata hai
jahan main doobati hoon
rangon ke is aseem dariya mein
rang apne DhooDhtee hoon.

Thursday, 29 September 2011

पूरब की हूँ - श्यामल सी - I am the dusky one -poorab ki hu.n - Shyamal si

English: Line art drawing of the A note Españo...
शाम में शामिल रंगों को ओढ़े
नज़र में बटोर के मचलते मंज़र
ढलते हुए दिन के चेहरे में
मुट्ठी भर उजाला ढूँढ़्ती हूँ।

पूरब की हूँ - श्यामल सी
सूरज को अपने
गर्दिशों में ज़मीं की ढूढ़्ती हूँ।

पहन के पैरों में पायल
बहकती हवाओं की
फ़िज़ाओं के सुरीले तरन्नुम में
गुनगुनाहटें (or आहटें) ज़िन्दगी की ढूढ़्ती हूं 

पूरब की हूँ - श्यामल सी
सूरज को अपने
गर्दिशों में ज़मीं की ढूढ़्ती हूँ।

उठती निगाहों में
भर के कायनात का काजल
दूर कहीं छोर पर उफ़क के
टिमटिमाता वो सितारा ढूढ़्ती हूं

पूरब की हूँ - श्यामल सी
सूरज को अपने
गर्दिशों में ज़मीं की ढूढ़्ती हूँ।

शोख फूलों को
घूंट मस्ती के पिलाकर
चहकती धूप को आंगन में बिछाकर
ओस की बूंद में अम्बर को ढूँढ़्ती हूँ

पूरब की हूँ - श्यामल सी
सूरज को अपने
गर्दिशों में ज़मीं की ढूढ़्ती हूँ।

मीना 
 -------------------------------------------
(A rough translation)
Bedecked I am
with the setting colours
risen from the shores of a silent dusk
as I  face a setting day
with rippling panoramic moments
that twinkle my eyes 
and with all this within me
I seek 
the handful of a dawning light.

I have adorned my feet with the anklets
of the tinkling restless breeze
and I look for the fading footsteps
in the rhythmic musical notes of 
the nature that surround me 

I am the dusky one 
from the east 
and I look for my sun light 
in the strife of the life 
--------------------------------------
shaam mei.n shaamil
rango.n ko o.Dhe
Dhalte hue din ke chehare mei.n
nazar me baTore machalte manzar
MuTThi bhar ujaala Dhu.Dhatee hun

pahan ke pairon me payal
bahakati hawaon ki
fizaon ke sureele tarannum me
zindagi ki aahaT DhuDTi hun

poorab ki hu.n - Shyamal si
sooraj ko apane
gardishon mei.n
zamee.n ki Dhu.Dhatee hu.n

uThati nigahon me
bhar ke kayanaat ka kajal
door kahin chhor par ufak ke
TimTimata wo sitara DhuDhati hun.

poorab ki hu.n (Shaamal si) 
sooraj ko apane
gardishon mei.n
zamee.n ki Dhu.Dhatee hu.n

shokh phulon ko
ghoonTh masti ke pilakar
chahakti dhoop ko aangan me bichhakar
os ki boond me ambar(saagar) ko dhuDhati hun 

poorab ki hu.n (Shaamal si) 
sooraj ko apane
gardishon mei.n
zamee.n ki Dhu.Dhatee hu.n
- Meena Chopra
Enhanced by Zemanta

आवर्तन


टेढ़े और तिरछे रास्तों
पर चलती लकीरें
ये, पुराने आयामों से निकल
उन्हीं में ढलती
ये लकीरें
परिधि के किसी
कोने में अटक
बिन्दु को अपने तलाशती
भटकती रहीं।
भटकती रहीं।

फिर देखा
गोल सा सूरज
टूट चुका था।
ज़हन में भर चुके थे टुकड़े।
चापों में बट चुकी थी
रोशनीप्पा चप्पा।
वक़्त में जमी और रुकी ये चापें
आज खड़ी हैं रूबरू मेरे
सिर्फ़ पत्थर ही पत्थर
दिखाई देते हैं।

आँखें चुभती हैं
जिस्म के हर कोने में।
दबी दबी
थर्राई हुई
इंतज़ार में तो बस
एक ही कि
कब इन चापों में
बँधी रोशनी पिघले?
लावा बनकर
ज़िंदगी के चक्के में
कुछ ऐसी घूमे
बस घूमती ही
चली जाए

-मीना चोपड़ा

Saturday, 24 September 2011

बारिश के खिलोने - Misty Madness


 दौड़ती नज़रें जब
गुज़रे समय की सड़क पर
देखतीं हैं वापस मुड़कर
तो दिखाई देते हैं
दूर छोर पर खड़े
कुछ बारिश के खिलोने
और धूप की नर्मी में भीगे पुराने रिश्ते

और कुछ --
वक्त की धुन्ध में मिटते
पाओं के निशान।
-मीना चोपड़ा 


Blank eyes see
the vanishing point,
the skyline of the past.
I capture
the falling rainfall.
A soothing touch ,
the by gone sunshine
wet with the kisses of a rainbow.
Footsteps fade
in the misty madness of time.

(Trans-created from Hindi into English)
-Meena Chopra

 

Thursday, 22 September 2011

A Death, A Beginning - अरसे से गूँजती आवाज़

Have you ever searched?
Your lost self
unfolding those
ruthless cold nights
inside me ... ?
  Ever dreamt-?
  The blazing honesty of
  my unyielding
  unborn
  unprotected
  vulnerable naked self 
  in your arms,
enslaved in disastrous fantasies,
  tearing me apart
  making me a whole
  grasping a moment
  beyond bondages,
  seizing
  a death,
  a beginning
  an eternal embrace
  unraveling mysteries
  unknown ... ?
Have you ever discovered,
worshipped,
my primeval existence
  within you.
  Recognizing
  loving  the woman in me!

-Meena Chopra

अरसे से गूँजती आवाज़

खोजा है कभी तुमने
अपनी खोई हुई पहचान को
अँधेरी, सियाह, ठंडी रातों की
खुलती हुई परतों के तले
ढकी हुई मेरी कोख की
सुलगती परतों में।

तसव्वुर्र के उस एक एहसास को
क्या महसूस किया है कभी तुमने
जहाँ एक अजन्मी, कोरी आग
की लपटों में लिपटा
मेरा कँपकपाता नाज़ुक सा जिस्म
कई टूटते ख्वाबों में उलझा रहा
तुम्हरी बाहों में
कभी उधेड़ता रहा और कभी बुनता रहा
भटकती साँसो के भटकते हुए सपने।

लम्हों को लम्हों में
तलाशता हुआ
वही एक आज़ाद सा लम्हा
उस मौत के आगा़ज़ को ढूढ़ता रहा
जिसमे का़यनात के आगोश से उतरा हुआ
एक अनजाना सा आगोश तुम्हारा
बाँधता रहा मेरी खुलती हुई परतों के
पल-पल पिघलते अन्तराल को-


पूछ्ती हूँ मैं तुमसे

कभी ढूढ़ी है तुमने
इबादत में झुकी नज़रों में
मेरी बरसों से बिछ्ड़ी हुई वही फ़रियाद
जन्मो से जन्मो तक बहती रही 
मुहोब्बत भरी आँखों की
झुकी पलकों में
झपकती हुई एक पुकार
सदियों से जूझती
सिर्फ़ तुम्हारे लिये
सदियों से बनी
हमेशाँ से वही तुम्हारी
-मैं
एक अरसे से गूँजती आवाज़।

-मीना चोपड़ा 
(अंग्रेजी से हिंदी में भावानुवाद)





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